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विल यू मेरी मी ? – डॉ, नीलिमा दुबे

29th January 2026

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रिचा शर्मा ,मुकुंद शुक्ला और राज वर्मा तीनों जितने अच्छे मित्र थे, एक ही कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे, उतने ही एक दुसरे की टांग खीचने में माहिर भी। अक्सर मुकुंद रिचा को चिडाया करता कि “देखना तुम्हारे पिताजी तुम्हारे लिए एक छोटा , मोटा लडका पसंद करेगें, जिसको तुम से मैच करने के लिए हम हील वाले जूते भेंट किया करेंगे।” बदले में रिचा कहती कि “तुम्हारी मम्मी भी तुम्हारे लिए ऎसी ही बहू लायेगीं जो सिर में चमेली का तेल डालकर कसके चोटी बनायेगी, और बालों में गजरे नहीं गेंदे के फ़ूल लटकाकर घूमेगी।” ऎसी ही अनेक नोंकझोंक में लगभग डेढ साल नौकरी के कहां निकल गये मालूम ही नहीं पडा।

इस बीच  रिचा के पिता, रिचा के रिश्ते के लिए हर दिन परेशान होते । विवाह की बात कई जगह चलती परंतु किसी न किसी कारण हरबार  टल जाती । अपने कारण पिता को उदास व निराश देख रिचा अंदर ही अंदर बस तडप कर रह जाती । न सिर पर मां का साया,न भाई का। ईश्वर की कृपा से तीन बहने थीं वे अपने अपने परिवार में अतिव्यस्त थीं। रिचा कि शादी में सबसे बडी उलझन थी, उसके चेहरे पर एक्सीडेंट के निशान होना।

पन्द्रहवी बार रिश्ते का टूटना और पिता के मैसिव हार्ट अटैक से रिचा अंदर ही अंदर टूटने लगी थी। कई बार सोचती कि शायद मां होतीं या भाई होता तो रिश्ता ढूंढने में पिताजी की मदद करता, मगर कोई राह सूझती ही नहीं थी।

एक बार एक परिचित ने पास के छोटे कस्बे के एक परिवार से एक रिश्ते की बात चलाई। रिचा की फ़ोटो को पसंद कर उन लोगों ने दहेज में २० लाख की मांग रखी। मजबूर पिता ने जब उसे स्वीकार किया तो रिचा मन ही मन भभक उठी, परंतु मौन थी। अगले दिन रोज की तरह कॉलेज पहुंची। आते समय मुकुंद व राज को घर आने का निमंत्रण दे आयी। कहा- “पिताजी ने घर पर बुलाया है, दोनों को। ” दोनों मित्रों के लिए यह कुछ अलग नहीं था क्योंकि वे अक्सर रिचा के घर आया करते थे एवं उसके पिता से भी घटों दर्शन और विज्ञान पर चर्चा किया करते थे। शाम को जब दोनों घर पहुचे तो पिता बाहर गये हुए थे। बैठक में बिठाते हुए रिचा बोली- दरसल आज मैंने तुम दोनों को घर बुलाया है। वैसे मैं चाहती तो अकेले मुकुंद तुमको भी बुला सकती थी, फ़िर सोचा कि राज भी साथ हो तो ठीक रहेगा। “राज और मुकुंद एक दूसरे को देख रहे थे मगर समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

मुकुंद बोला- क्या मतलब ?

रिचा का चेहरा बेहद गंभीर हो गया। उसने मुकुंद की ओर देखा और कहा- विल यू मेरी मी ? सुनते ही मुकुंद हडबडा कर खडा हो गया। कहा- “ये क्या मजाक है? रिचा ।”

“मजाक नहीं मुकुंद मैं सीरियसली पूंछ रही हूं कि क्या तुम मुझसे शादी करोगे? अगर इस सवाल का जवाब ना भी है तो ठीक है, परंतु मैं चाहती हूं कि तुम ईमानदारी से इस सवाल का जवाब दो। “

राज बेचारा रिचा और मुकुंद की ओर बारी बारी से ताक रहा था। मन में सोच रहा था कि यह क्या स्थिति बन गयी ,अचानक?  कभी हल्की सी बेचैनी के कारण कमरे में चलने लगता था। वह किस मित्र को क्या कहे उसके सामने यह विकट समस्या थी। “सवाल का जवाब दो, यानि क्या रिचा? शादी कोई मजाक है? माना हम बहुत अच्छे दोस्त हैं। हंसी मजाक करते हैं, अच्छी कंपनी है एक दूसरे के लिए, मगर …..ये शादी की बात?…….यार राज , तू क्या यहां वहां घूम रहा है? समझा इसको? यह क्या बोल रही है?”  राज बोला – मुझसे क्या पूंछ रहा है

तुम दोनों के बीच की बात है। वह तुमसे ही सीधे पूंछ रही है, जो ठीक समझो उत्तर दे दो यार”

कुछ मिनिट बहुत विचित्र सा सन्नाटा रहा फ़िर मुकुंद बोला- “देखो रिचा, मैं इस बात के लिए तैयार नहीं हूं। मुझे लगता है कि मुझे कुछ वक्त चाहिए।” रिचा ने कहा -“कोई बात नहीं  ,सोचकर बता दो। दीदी और पिताजी मेरे लिए आये दिन लडका ढूंढ रहे हैं। मैंने सोचा कि मैं भी उनकी मदद कर दूं, इसलिए तुमसे सीधे ही पूछ लिया। हां कहने की मजबूरी नहीं है, लेकिन तुम्हारा जो भी उत्तर होगा मैं हमेशा के लिए उसे सच मान लूंगी।” फ़िर मुस्कुराई और बोली- “मूझे किसी न किसी से तो अरेंज मेरीज करनी ही है। तुम एलिजिबल लगे तो पूंछ लिया।”

“ठीक है तीन दिन की छुट्टी है, भोपाल जा रहा हूं, अगले वीक मिलते हैं कॉलेज में।”-यह कह कर राज और मुकुंद चले जाते हैं। थोडी देर बाद पिताजी घर लौटते हैं व रिचा को बताते हैं कि बडी दीदी का फ़ोन आया था लेकिन बात न हो सकी। रात्रि भोजन की बाद फ़िर उनसे बात करेगें, शायद जबलपुर से तुम्हारे लिए कोई रिश्ता की बात करना चाह रही है। तभी अचानक दरवाजे पर दस्तक होती है और मुकुंद व राज प्रवेशकर पिताजी से अनुरोध करते हैं कि अगर उनकी अनुमति हो तो कॉलेज के एक कार्यक्रम के सिलसिले में दो मिनिट रिचा से अकेले में बात करना चाहते हैं। रिचा के घर से बाहर आते ही मुकुंद बोला- मैंने तुम्हारी बात को बहुत ध्यान से सोचा रिचा। टू बी वेरी ऑनेस्ट विथ यू! मैं अभी शादी के लिए तैयार नहीं हूं। तुम तो जानती हो जब से भाई ने लव मेरीज की है, मां कितनी दुखी हैं। मैंने उनको प्रॉमिस किया है कि मैं उनकी ही पसंद से शादी करुंगा। मां इस समय मेरी बहन के पास आस्ट्रेलिया में हैं । तीन महीने बाद लौटेगीं । इतना वक्त तुम्हारे पास नहीं हैं। मैं जनता हूं तुम्हारा रिश्ता अंकल एक जगह लगभग तय चुके हैं। अगर वह लडका तुमको पसंद नहीं है तो मैं तुम्हारी सहायता करने को तैयार हूं। बस पिताजी को कह दो तुम मुझसे शादी करना चाहती हो। तो तुम उस शादी से बच सकती हो।”

“नहीं मुकुंद ! ऎसी मदद कि जरुरत नहीं मुझे। तुमने जिस ईमानदारी से जवाब दिया , काफ़ी है। थैंक यू….।” उन दोनों को विदा कर वह घर के दरवाजे बंद कर ही रही थी कि पिता ने बताया कि कल सुबह की गाडी से जबलपुर जाना है। दीदी ने जो रिश्ता बताया है, वह लडका मिलना चाहता है और उसके घर वाले भी। अगले दिन पिता व रिचा ,लडके व उसके  परिवार वालों से मिले। सबको सब कुछ यूं पसंद आ गया कि ईश्वर ने जैसे सब पहले ही तय कर रखा हो। बातचीत के बाद अगले दिन “रोका” भी हो गया और सगाई भी।

एक नई खुशी पा कर रिचा मन ही मन संतुष्ट थी। अन्य जरुरी काम निपटाकर जब वह कॉलेज पहुंची तो मुकुंद बेताब सा इंतजार कर रहा था। रिचा को देखते ही बोला- “कहां थीं तुम सात दिनों से रिचा? मैं पागलों की तरह तुम्हारा इंतजार कर रहा था। पडोसियों से पूछा, कितनी बार राज को तुम्हारे घर भेजा। कहीं किसी कुछ पता नहीं।” होल्ड ऑन मुकुंद! मैं बस पिताजी के साथ जबलपुर गयी थी दो दिन के लिए। वापस आनेपर कुछ काम में…..। रिचा आगे कहती कि मुकुन्द ने उसका हाथ पकडा और विजिटर्स रुम में ले गया। एक कुर्सी पर बैठाने के बाद बोला- प्लीज अब मेरी सुनो । उस दिन मैंने तुमसे कहा कि मैं तुमसे शादी करने को तैयार नहीं हूं, मगर मैं मूर्ख था रिचा । सच तो यह है कि मैं हमेशा से तुम्हें चाहता था। अचानक तुम्हारे पूछने पर मैं बहुत नर्वस हो गया था, परंतु मां से जब तुम्हारे में बारे में फ़ोन पर बात की तो उन्होंने मुझे डांटा और कहा कि वह तुम्हें और तुम्हारे परिवार को जानती हैं। साथ ही तुमको बहू के रुप में पाकर उनको बहुत खुशी होगी। तभी से ये अंगूठी लेकर हर पल तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं। “ अंगूठी लेकर मुकुंद घुटनों पर बैठा और बोला- “रिचा शर्मा, विल यू मेरी मी? क्या मुझसे शादी करोगी?” जवाब मे रिचा मौन थी। फ़िर वही कुछ मिनिट का विचित्र सन्नाटा…..। थोडी सहज होते हुए रिचा ने अपनी हाथ की अंगूठी दिखाई व बोली- माफ़ कीजिए मुकुंद शुक्ला! अब ये संभव नहीं, क्योंकि मैं किसी और को अपना मान चुकी हूं। छ्ह दिन पहले मेरी सगाई हो चुकी है॥“

सुनते ही मुकुंद आंखों में आंसू लिए खडा हो गया। और बोला- “कह दो कि ये एक मजाक है, और अगर सच भी है तो भी अब भी कुछ हो सकता है। प्लीज रिचा।“

“नहीं! कुछ नहीं हो सकता। जिसे भी मैंने चुना है, अपनी पसंद से चुना है।“ यह कहते कहते रिचा कमरे से निकल गई। मुकुंद उसे बेबस सा कमरे से ही नहीं अपनी जिंदगी से भी बाहर जाते देख रहा था। उसके कानों में रिचा के “विल यू मेरी मी?” शब्द अब भी गूंज रहे थे ।

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