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साहित्य समर्था, जयपुर (रजस्थान) द्वारा “सर्वश्रेष्ठ कहानी” राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त यह कहानी, लेखिका: – डॉ, नीलिमा दुबे

19th February 2026

https://medium.com/@dneelima53/%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A4-%E0%A4%89%E0%A4%B8-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%80-b46c51dbc222

बात उस रात की

“तुम्हारी जिद के आगे तो भगवान की भी नहीं चलती, मेरे कहने से क्या समझोगी, प्रिया?….बस दो दिन की बात है मैं इंडिया पहुँच रहा हूं। जानता हूं। बहुत कठिन समय है, पर दिमाग से काम लो, प्लीज! क्या मैं नहीं चाहता कि मुन्ना ठीक हो? जीवन है, वो हमारा। डॉक्टर हमसे अधिक जानते हैं। उन्होंने ही अगर ईश्वर पर छोड़ दिया है तो हमें भी समझना……….”

“नही मैं नहीं समझना चाहती”- राहुल की बात को बीच में ही काटकर प्रिया बोली- ये कोई साधारण बात नहीं है, एक दैविक संयोग ही है कि अविनाश यू.के. से यहां भोपाल आया है। वह भी उन डॉक्टर्स की टीम के साथ जो बच्चों की कठिन बीमारियों का ईलाज कर रहे हैं। डेढ दिन का तो सफ़र है,बस से। मैं पहुंच जाऊंगी। तुम भी सिंगापुर से लौटकर वहीं आ जाना।”

राहुल कुछ देर चुप रहा, फ़िर बोला-” जैसी तुम्हारी मर्जी। मैं इस चिंता में हूं कि पिछले 28 दिनों में तुम शायद ही सोई हो। अकेले इतना लंबा सफ़र कैसे कर सकोगी, जबकि मुन्ने की हालत इतनी गंभीर है।”

“मेरी छोड़ो राहुल! उसकी नाडी अभी भी चल रही है।”

राहुल को प्रिया की वाणी में एक अंतिम आशा नजर आ रही थी। उसने सिंगापुर से ही अपने ऑफ़िस बॉय प्रमोद को फ़ोन करके कहा कि मेडम को रात की बस से इंदौर के लिए बिठा दे। उन्हें वहां से भोपाल जाना है। साथ ही खाने आदि का प्रबंध भी कर दे। प्रिया को राहुल ने यह चेतावनी भी दी कि सुबह जब वह इंदौर पहुंचे तो अपनी सहेली दामिनी के घर दो-तीन घंटे आराम करके, कुछ खाकर ही आगे के लिए रवाना हो। हलाकि उस समय इंदौर से भोपाल का सफ़र लगभग ४-५ घंटे का हुआ करता था, लेकिन राहुल को प्रिया कि चिंता थी क्योंकि उसकी तबियत भी दिन पर दिन कमजोर हो रही थी। दूसरी ओर उसे स्वंय पर भी गुस्सा आ रहा था कि अगर नौकरी की मजबूरी न होती तो वह कभी भी अपने दस महीने के बच्चे और पत्नी को छोड़कर कंपनी के दौरे पर सिंगापुर नहीं आता।
 
यद्यपि यह कोई पहला अवसर नहीं था कि प्रिया बच्चे के साथ अकेली सफ़र कर रही हो,परंतु प्रिया मानसिक और भावनात्मक रुप से अंदर ही अंदर टूटा हुआ महसूस कर रही थी। बरहाल प्रमोद बस टिकट लेकर समय से पहुंचा,और बस में बिठा कर सभी दवाईयां व खाना आदि देकर प्रिया से बोला – “मेडम , आप अपना व मुन्ने का ध्यान रखियेगा। सफ़र में कभी भी जरुरत हो तो फ़ोन कीजियेगा। सुना है कि इंदौर से भोपाल जाते समय जो जंगल का क्षेत्र पड़ता है, वह बेहद खतरनाक है। अनेक दुर्घटनाओं के बारे में आये दिन सुनते रहते हैं। बेहतर हो कि आप भोपाल का सफ़र दिन ही दिन में पूरा कर लें।”
प्रिया ने आश्वस्त किया कि वह पहुंचते ही उसे व राहुल को सूचित कर देगी। उसे तो बस एक ही धुन लगी थी कि कैसे उसके मुन्ने को जीवन दान मिल जाय।
ठीक १० बजकर ३० मिनिट पर बस इंदौर के लिए रवाना हुई। रात भर मुन्ना बहुत बेचैन रहा । रास्ते भर उसे उलटियां होतीं रहीं। रात कब बीती पता ही न चला। सुबह नौ बजे प्रिया दामिनी के घर पहुंची। दमिनी प्रिया को देखकर दंग रह गयी। दौड़कर गले लगी और बोली-” यहां से पूना शिफ़्ट हुए केवल छ: महीने हुए है तुझे। तू क्या से क्या हो गयी यार! काले गड्डों में पीली आंखे? चेहरे की चमक तो जाने कहां चली गई? इतना तनाव  कैसे झेल रही है अकेले? तू लौट क्यों  नहीं आती? यहां सब हैं तेरे आसपास।”
“हां! सोचती हूं , पहले ये ठीक हो जाय।”- प्रिया ने धीरे से जवाब दिया।
” तू चिंता मत कर सब ठीक हो जायेगा। बच्चों के जब दांत निकलते हैं तो उनकी हालत नरम गरम हो जाती है। तू वहां अकेली पड़ गयी बस।” दमिनी समझाते हुए आगे बोली-” पहले नाश्ता करके दो तीन घंटे आरम कर, तब तक मैं इसे संभालती हूं। तुझे फ़िर ४-५ घंटे का सफ़र करना है।”
अपनी सहेली से मिलकर प्रिया कुछ हल्का महसूस कर रही थी। हालात तो जैसे के तैसे ही थे, लेकिन अपनेपन और मित्रता के प्रेम में दिल और दिमाग को संभालने की एक अदभुत शक्ति होती है। यही ताकत प्रिया महसूस कर रही थी। हल्की सी झपकी लगी, प्रिया को आराम मिला। उधर मुन्ने को दामिनी लगातार संभालती रही।
बादलों की गड़गड़ाहट से प्रिया की नींद खुली तो फ़ौरन भोपाल की तैयारी करने लगी, परंतु तब तक लगभग शाम हो चुकी थी। दमिनी बार बार कहती रही कि आज यहीं आराम कर लो कल तड़के निकल जाना। प्रिया को स्वयं पर बेहद नराजगी हो रही थी, कि उसे इतना लापरवाह नहीं होना चाहिये था। अगर उसने आराम न किया होता तो शायद वह इस समय तक भोपाल पहुंच चुकी होती। ऊपर से मौसम इतना खराब था कि लगता था कि बादल आज ही सारा जल बरसा देना चाहते हो। मूसलाधार बारिश में टैक्सी मिलना और भी मुश्किल हो रहा था। दामिनी ने पडौसी नागर जी से प्रार्थना की कि वे उनकी मदद करें। नागर जी की कार से दामिनी व प्रिया किसी तरह बस स्टेंड़ पहुंच सकीं। यहां तक आते हुए नागर जी और दामिनी प्रिया को रात रुकने का आग्रह रहे कि अकेले इस हालत में सफ़र करना, वह भी ऐसी बारिश में बहुत बडा रिस्क है, क्योंकि यह तय था कि भोपाल पहुंचने में लगभग रात्री के 8 तो बज ही जायेंगे। बस स्टेंड पहुंच कर मालूम हुआ कि कई बसें रद्ध हो चुकी हैं। केवल एक ही म.प्र.रोड़वेज़ की बस ‘इंदौर – बुरहानपुर’ जायेगी जो भोपाल नौ बजे तक पहुंचेगी। प्रिया ने दोनों से कहा कि रात के नौ, देर रात्री नहीं है। बस में अनेक यात्री होते हैं तो अकेलापन कैसा? फिर बस स्टेंड पर दीदी व अविनाश आ ही रहे हैं लेने को। इस प्रकार दामिनी व नागर जी से विदा लेकर वह भोपाल के लिए निकल पडी।
प्रिया खुद मध्य प्रदेश की पली बडी थी। वह भली भांति जानती थी कि दामिनी से लेकर राहुल तक उसके अकेले रात्री के सफ़र पर जाने की चिंता क्यों कर रहे हैं, परंतु उसने सारी आशंकाओं को किनारे लगाया। बस में चढते हुए देखा, बस खचाखच भरी हुई है। उसकी सीट के आसपास कई देहाती महिलाएं अपने बच्चों को लिए बैठी थीं। बस चलते ही उसे मन ही मन लगने लगा कि इलाज के लिए भोपाल आने का निर्णय सही लिया था। लगभग एक महीने से मुन्ना कितनी पीडा से गुजर रहा था। अनजाने शहर की अपनी चुनौतियां होती हैं। यहां का सब कुछ अपना सा लग रहा है, जो मन को संबल देता है कि अब शायद कुछ संभल जाय। अपना घर अपना ही होता है। ये सुना और  पढा बहुत था, लेकिन वह महसूस पहली बार कर रही थी। कई दिनों बाद आज मुन्ने की हालत भी थोडी अलग थी। यद्यपि उसने 28 घंटे से दूध नहीं पिया था लेकिन, अब सोने लगा था।
मन की शांति स्वस्थ नींद का आधार होती है। मुन्ने की हालत क्या होगी से अधिक मानसिक स्थिरता प्रिया को मिलने लगी थी, कि अब वह यहां अकेली नहीं है, ‘अपने’ सब साथ हैं।
यह सोचते सोचते कि छह महीने पहले ही वह मुन्ने को लेकर राहुल के साथ पूना गयी थी। तब सभी बडे बूढों ने मना किया था, कि छोटे बच्चे के साथ अनजान शहर में बसना ठीक नहीं, परंतु इतना मुश्किल होगा इसकी तो कल्पना ही नहीं की थी। हंसता खेलता बालक कैसे सधारण डिहाईड्रेशन में लगातार गंभीर होता चला गया कि 28 दिन के लगातार उपचार के बाद भी उसक हालत नहीं सुधर रही थी। फिर अचानक कंपनी ने राहुल को 5 दिनों के लिए सिंगापुर भेज दिया। उसी दौरान अविनाश, जो प्रिया का छोटा भाई है, मेडिसिन में यू.के. में प्रेक्टिस कर रहा था, उसका फ़ोन आया और उसी के कहने पर प्रिया अपने बेटे को लिए मिलने जा रही है। सोचते सोचते वह गहरी नींद में सो गयी मुन्ना भी कई दिनों बाद सोया था , सो उसे समय का ध्यान नहीं रहा।
कुछ घंटों बाद अचानक झटके से उसकी नींद खुली। प्रिया को लगा कि भॊपाल आ गया,लेकिन अगले ही पल जो उसने देखा तो पैरों तले जमीन खिसक गयी। पूरी बस में उसने नजर दौडाई, बस एकदम खाली थी। रास्ते में सारी सवारियाँ कब व कहां उतर गयीं उसे एहसास तक नहीं हुआ। खिड़की से बाहर झांका तो मौसम इतना खराब था कि बारिश में रास्ता दिखाई ही नहीं देता था। बस के अंदर भी अंधेरा और बाहर भी घना अंधेरा। बस की हेडलाईट से जो अतिमध्यम प्रकाश आ रहा था उसमें हल्की सी परछाईं  देखी जा सकती थी , अगर कोई नजर गढ़ा कर देखे तो।
प्रिया ने सपने में भी कभी नहीं सोचा था कि इतने खाराब मौसम में जबकी पूरी बस यात्रियों से भरी थी वह इस तरह सूनसान रास्ते में अकेली रह जायेगी। घबराहट में उसे अजीब सी बैचेनी लगने लगी थी। अभी मुन्ने और सामान को टटोल ही रही थी कि  उसकी नजर तीन सीट छोड़कर उस विचित्र आकृति पर पड़ी जो सीट में तिरछी सी दिखाई पड़ती थी। बिजली लगातार चमक रही थी। उसकी रोशनी में प्रिया को समझते देर नहीं लगी कि वहां एक बेहद असभ्य और भयानक कोई पुरुष बैठा है, जो उसे घूरे जा रहा है। बीच बीच में ड्राईवर के केबिन में जो एक और देहती लड़का बैठा है, वह उससे निमाडी भाषा में बात कर रहा है फिर बेशर्मी से वे दोनों हंसने लगते थे। वे ड्राईवर से भी बात करते थे पर वह उनकी किसी भी बात का जवाब नही देता था।
संकट की घड़ी में बुरे ख्याल पहले आने लगते हैं। ड्राईवर को हटा दें तो पूरी बस में एक महिला यात्री के अलावा दो पुरुष मौजूद थे। कुल मिलाकर बस के अंदर और बाहर दोनों का महौल सामान्य तो नहीं कहा जा सकता था। हद तो तब हो गई कि वे दोनो पुरुष दो सीट नजदीक आकर बैठे ही नहीं बल्कि शराब की बोतल निकाल कर पीने भी लगे थे। उन्हें इस बात से कोई सरोकार नही था कि प्रिया बेहद असहज और असुरक्षित महसूस कर रही थी। बारिश के शोर में भी वे इतनी जोर से घटिया बातें कर रहे थे कि उन्हें पूरी तरह अनदेखा करने के बाद भी अनसुना करना असंभव हो रहा था। अब प्रिया को काटो तो खून नहीं, वह जान चुकी थी कि बादल बरसात के ही नहीं संकट के भी घिर चुके हैं।
अब क्या…………..?
एक सेकेन्ड के लिए उसका दिल बैठ गया। फिर उसने संकट मोचन हनुमान पढ़ना शुरु किया। अभी यह पाठ  समाप्त ही किया था कि अचानक प्रिया को याद आया कि एन.सी.सी. के प्रशिक्षण के दौरान उसकी सेल्फ डिफेंस यानि आत्मरक्षा की ट्रेनिंग हुई थी। वह स्वयं आत्मरक्षा प्रशिक्षण की विजेता भी रह चुकी है। प्रथम स्थान के लिए जो उसका अंतिम इंटरव्यूह था , उसकी आँखों में घूम गया।
एन.सी.सी. हेड्क्वाटर , सिटी भोपाल के एक कमरे में सेल्फ़डिफेन्स इन्स्ट्रक्टर कर्नल लाखनसिंह सर बैठे हैं और प्रिया आर्मी की वर्दी में केडेट के रुप में सेल्यूट करके उनके सामने खड़ी है।
“केडिट प्रिया ! आत्मरक्षा का पहला नियम?”
“दुश्मन अगर सामने भी हो, लगे कि वह ताकतवर है, तो भी डर व चिंता पर तुरंत काबू पाना, सर  ।”
इस विचार के आते ही प्रिया को महसूस हुआ कि उसके शरीर का पसीना सूखने लगा है। आंखों और सिर में गर्म खून का ज्वार अब तेजी से सामान्य हो रहा है। प्रिया के चेहरे पर अब घबराहट नहीं , स्थिति से निबटने का साहस अपने आप आ रह था।
“केडिट ! आत्मरक्षा का दूसरा नियम?”
“दिमाग से काम लेना, सर। चारों ओर तक्ष्ण मौजूद चीजों पर निगाह दौड़ाना, जिसे हम अपना हथियार बना सकते हैं”
प्रिया ने तुरंत नोटिस किया कि आगे वाली सीट के नीचे किसी बुजुर्ग की लाठी छूट गयी है,उसने फ़ौरन उसे अपने पैरों से खीचकर नीचे दबा लिया कि चलती बस के कारण वह सरक कर दूर न चली जाय।
अब दो में से एक पुरुष टांगे फैलाकर बैठ गया और सिगरेट का धुँआ जानबूझकर उसी दिशा में छोड़ने लगा जहां प्रिया बच्चे के साथ बैठी थी।
“आत्मरक्षा का तीसरा नियम केडिट?”
“अपने पास मौजूद चीजों से हथियार बनाना ,सर ।”
प्रिया अपने पर्स में उस चैन को खोजने लगी जो वह सामान बांधने के लिए हमेशा अपने साथ रखती है। वह तो उसके हाथ लगी ही, साथ में वह चाकू भी मिल गया जो फ़ल काटने के लिए वह साथ लायी थी।
लाखनसिह सर का अगला प्रश्न- “सिगनल नहीं हो तो क्या कॉल डिवाइस बेकार है?”
“नहीं सर। सिगनल न होने पर भी अगर डिवाइस से कॉल किया जाय तो भी रिसीवर के पास ये मेसेज पहुँच जाता है कि फ़लां टावर से अमुक नम्बर कॉल की कोशिश कर रहा है।”
प्रिया ने तुरंत अपना आइफोन निकाला, और राहुल का नंबर मिलाया। कॉल कैसे लगता नेट और सिगनल दोनों कमजोर थे। जंगल से बस जो गुजर रही थी। समय देखा तो रात के ग्यारह बज रहे थे। बस भोपाल के ही रास्ते पर जारही है, यह भी नहीं कहा जा सकता था। बारिश जो थमने नाम ही नहीं लेती थी। प्रिया ने मेबाइल से अपने टिकट की फोटो खीच कर एक मेसेज के साथ राहुल को भेजी कि-“ ये मेरा भोपाल का टिकट है।नौ बजे पहुंच जाना था, लेकिन अभी भी जंगलवाले  रास्ते में हैं। महिला सवारी में केवल मैं हूं, और दो बेहद अभद्र आदमी हैं….”
सिगनल नहीं हैं ये जानते हुए भी प्रिया लगातार अपनी दीदी,अविनाश, दामिनी प्रमोद को लगातार कॉल किए जा रही थी, कि अचानक मुन्ना उठ गया। रो-रो कर अपनी भूख दर्ज करने लगा। तभी पुरुष दो (देहाती लड़का) का कथन प्रिया के कानों तक पहुंचा – “मियां यार! ये बताओ कि बच्चे को दूध कैसे पिलाते हैं?” और निहायती बेहूदगी से ही ही ही …करके हँसने लगा। पुरुष एक भी उसी अंदाज में लहक कर बोला-“जरा ठहरो, सब जान जाओगे।” फिर दोनों प्रिया की ओर देख कर जोर जोर से हंसने लगे। प्रिया का रोम रोम अब क्रोध की आग से भभक उठा था।
उसने मुन्ने को शहद चटाकर , हैंड बैग की सहयता से ,खिड़की की तरफ इस प्रकार लिटा दिया कि वह चलती गाड़ी में भी बिना गिरे सुरक्षित रहे।
आधुनिक माँ की ममता, स्नेह, सतर्कता और तैयारी की गहराई कई छिछले पुरुष नही समझ पाते।
एक बार फिर लाखनसिंह सर का प्रश्न गूंज उठा। 
“केडिट! शरीर की सबसे मजबूत हड्डी जिसका आत्मरक्षा के लिए उपयोग किया जाता है?”
“दोनों कोहनियों से हाथ की हथेलियों तक की हड्डी सर”….हेमर स्ट्राईक, ग्रोइन किक,हील, पाम, एलबो स्ट्राईक सहित अनेक विधियां उसे एक झटके में ताजा हो आयीं।
भयभीत प्रिया के मन में अब आत्मविश्वास और लड़ने का हैसला पूरी तरह पैर पसार चुका था। बस लगातार चल रही थी। पुरुष एक अपनी जगह से उठकर ठीक प्रिया के सामने वाली सीट पर आकर जम गया था। पुरुष दो अभी उठने ही वाला था कि ड्राईवर गुर्राया, और बहुत गुस्से में पुरुष दो को केबिन में बुलाया। झूमता हुआ किसी तरह वह ड्राइवर के केबिन में पहुंचा। उन दोनों के बीच विवाद होने लगा और अचानक ड्राइवर बस चार गुनी गति से दौड़ाने लगा।
इधर मोबाइल की घंटी बजी देखा तो राहुल का फोन था। तुरंत प्रिया ने कहा-“ हेलो राहुल!” रिसीव करते करते हड़बड़ाहट में स्पीकर का बटन दब गया। बस में राहुल की आवाज़ गूंजने लगी। पुरुष एक संभल कर व्य्वस्थित बैठ गया। राहुल बेहद गिस्से में था, और चिंता में भी बोला-“सबको परेशान करके रखा है तुमने! तुम्हारा टिकट का फोटो और मेसेज एक घंटे पहले ही मिल गया था, लेकिन तुम से बात नहीं हो पा रही थी। मैंने अपपने मित्र देवेन्द्र को थाने में फोन कर दिया था। चिंता मत करो। बस को ट्रेस कर लिया है। बीस मिनिट में ये सीहोर पहुंच जायेगी। अविनाश और दीदी भी कार से सीहोर की ओर रवना हो चुके हैं। बस ड्राइवर नाम भी पता चल गया है। शंभूनाथ! उसका रिकार्ड भी अच्छा है। तुम बस…….” फोन कट गया ।
फोन कटते ही पुरुष एक को ना जाने क्या हुआ? देशी हिन्दी में धारा प्रवाह गालियाँ बकने लगा। प्रिया ने एक हाथ में लोहे की चैन और दूसरे हाथ में फ्ल काटने वाला चाकू संभाल रखा था, कि चींईईईईईई करके ड्राइवर ने ब्रेक लगाया। वेग इतना अधिक था कि पुरुष एक सीट से लुढ़क कर नीचे गिर गया था और मुन्ने को गिरने से बचाने के लिए प्रिया ने कस के उसे पकड़ लिया था।
ड्राइवर झल्लाकर खिड़की से चिल्ला रहा था –“भरी बारिश में जब एक फलांग का भी दिख नहीं रहा तो बीच सड़क पर खड़े हो कर बस रोकने का क्या रिवाज है?”
प्रिया ने झांककर खिडकी से बाहर देखा तो किसी कॉलेज के कई छात्र बस रुकवाने के लिए खडे थे, जो किसी पिकनिक से लौटते समय उनकी बस खरब हो जाने के कारण लम्बे समय से परेशान लगते थे। वे सभी धड़धड़ाते हुए बरसात में तर ब तर अंदर घुस आये थे। उनकी धमाचौकड़ी के साथ बस एक बार फिर खचाखच भर चुकी थी। सभी को भोपाल जाना था।
प्रिया के दोनों हाथ प्रार्थना के लिए जुड़ गये, और उसकी झलकती आँखें सभी का धन्यवाद कर रही थीं……..
तभी राहुल ने प्रिया को बाहों में भरकर कहा-“मैं जनता हूं प्रिया, कि तुम टी.वी.पर ‘निर्भया’ का ये समाचार देख कर कहाँ खो गई हो। तुम बात उस रात की ही सोच रही हो ना?”
प्रिया बोली-“ईश्वर ‘निर्भया’ के जैसी दु:खद रात किसी की भी किस्मत में ना लिखे।”
 प्रिया के जीवन की उस रात की घटना को बीते छ: साल हो चुके हैं। मुन्ना भी स्वस्थ जीवन जी रहा है। लेकिन उसके मन में आज भी महिलाओं की सुरक्षा के कई सवाल सिरहन पैदा कर देते हैं।
Publish Link- https://medium.com/@dneelima53/कहानी-बात-उस-रात-की-b46c51dbc222
 
        Course Relevance – I & III sem BBA, Bcom, BCA students. As they are having story on woman safety and woman social issues.
Academic Concepts – The part one – Hindi Literature, as a reference of current situation of the society
Teaching Note – Faculty will discus about the safety of Indian woman on road, work place. About self defence and mental health.
Discussion Questions –
what was the Nirbhaya case?
What kind of legal changes or reforms came regarding woman safety in our country?
How much your awareness regarding self-defence and presence of mind?
References – This story is my original writing, which impaired by real incident in India.